“मैं सबसे अच्छा मूल्य के लिए सस्ती स्मार्ट दवाओं को कहाँ खरीद सकता हूं -जहां मैं सबसे अच्छा मूल्य के लिए सस्ती नई स्मार्ट दवा खरीद सकता हूं”

फल और सब्जियो में anti oxidents  होते है जो शरीर में फ्री रॅडिकल्स से लड़ते है. बॉडी में फ्री रॅडिकल बेबी की ग्रोथ पर बुरा असर डालते है. प्रेग्नेन्सी के वक़्त जो महिलाए फलो का सेवन अधिक करती है वो हेल्ती और इंटेलिजेंट बेबी को पैदा करती है.

रवि इका (Ravi Ika), संस्थापक एवं सीईओ, आरएक्सएडवांस ने कहा, ”प्रायोजकों के मुताबिक पीबीएम मूल्य प्रस्ताव को पुनर्परिभाषित करने की हमारी प्रतिबद्धता को स्मार्ट ने पूरी तरह स्वीकार किया। मेरा मानना है कि साथ मिलकर हम कुल दवा लागत को कम करने, बच सकने योग्य चिकित्सकीय लागत को कम करने और विशेषीकृत खर्च का अधिकतम प्रयोग करने के माध्यम से पीबीएम—कर्मचारी/संगठन साझेदारी का एक उद्योग मानक तैयार करना जारी रखेंगे।”

इस वेबसाइट में जो भी जानकारिया दी जा रही हैं, वो हमारे घरों में सदियों से अपनाये जाने वाले घरेल नुस्खे हैं जो हमारी दादी नानी या बड़े बुज़ुर्ग अक्सर ही इस्तेमाल किया करते थे, आज कल हम भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में इन सब को भूल गए हैं और छोटी मोटी बीमारी के लिए बिना डॉक्टर की सलाह से तुरंत गोली खा कर अपने शरीर को खराब कर देते हैं। तो ये वेबसाइट बस उसी भूले बिसरे ज्ञान को आगे बढ़ाने के लक्षय से बनाई गयी है। आप कोई भी उपचार करने से पहले अपने डॉक्टर से या वैद से परामर्श ज़रूर कर ले। यहाँ पर हम दवाएं नहीं बता रहे, हम सिर्फ घरेलु नुस्खे बता रहे हैं। कई बार एक ही घरेलु नुस्खा दो व्यक्तियों के लिए अलग अलग परिणाम देता हैं। इसलिए अपनी प्रकृति को जानते हुए उसके बाद ही कोई प्रयोग करे। इसके लिए आप अपने वैद से या डॉक्टर से संपर्क ज़रूर करे।

कार्डधारक जब “डेबिट” का चुनाव करता है तो लेनदेन की प्रक्रिया “ऑनलाइन” होती है। बिक्री के समय, कार्डधारक खरीददारी को अपने “पिन” से प्रमाणित करता है, रकम की जांच हो जाती है और जब मंजूरी मिल जाती है तो तुरंत कार्डधारक के चेकिंग खाते से व्यापारी के खाते में रकम स्थानांतरित हो जाती है।

भिंडी में ओजलेट अत्यधि‍क मात्रा में पाया जाता है, जो गुर्दे और पित्त में पथरी या स्टोन के खतरे को बढ़ा देता है, और पहले से मौजूद स्टोन को बढ़ाकर मजबूत कर देता है। इसके अलावा इसे भूनकर पकाने पर यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ा सकती है।

भारत में कृषि की विकास दर – posted on : Apr, 29 2016 भारत को आज़ाद हुए 59 साल हो चुके हैं और इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा में ज़बरदस्त बदलाव आया है. औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था का हुलिया ही बदल दिया है. लेकिन औद्योगिक विकास के बावजूद इन 59 सालों में एक तथ्य जो नहीं बदला है वो ये कि आज भी भारत के 65 से 70 फ़ीसदी लोग रोज़ी-रोटी के लिए कृषि और कृषि आधारित कामों पर निर्भर हैं. ! आज़ाद हुए 59 साल हो चुके हैं और इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा में ज़बरदस्त बदलाव आया है. औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था का हुलिया ही बदल दिया है. लेकिन औद्योगिक विकास के बावजूद इन 59 सालों में एक तथ्य जो नहीं बदला है वो ये कि आज भी भारत के 65 से 70 फ़ीसदी लोग रोज़ी-रोटी के लिए कृषि और कृषि आधारित कामों पर निर्भर हैं. भारत में कृषि की विकास दर और कुल विकास दर की तुलना ये एक अजीब विसंगति है कि जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है लेकिन कृषि में विकास की दर औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के मुकाबले कहीं कम है. भारतीय अर्थव्यवस्था के अन्य पहलू पिछले कुछ सालों में कृषि क्षेत्र में विकास दर दो से तीन प्रतिशत के बीच रही है. वर्ष 2002-03 में कृषि क्षेत्र में विकास दर शून्य से भी कम थी. 2003-04 में इसमें ज़बरदस्त उछाल आया और ये 10 फ़ीसदी हो गई लेकिन 2004-05 में विकास दर फिर लुढ़क गई और ऐसी लुढ़की कि 0.7 फ़ीसदी हो गई. आर्थिक प्रगति में इस विसंगति को केंद्र सरकार भी स्वीकार करती है. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल कहते हैं, “कृषि पीछे है इसमें कोई दो राय नहीं. अगर विकास दर को 10 फ़ीसदी करना है तो कृषि में भी चार फ़ीसदी की दर से विकास करना होगा दर और कुल विकास दर की तुलना ये एक अजीब विसंगति है कि जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है लेकिन कृषि में विकास की दर औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के मुकाबले कहीं कम है. भारतीय अर्थव्यवस्था के अन्य पहलू पिछले कुछ सालों में कृषि क्षेत्र में विकास दर दो से तीन प्रतिशत के बीच रही है. वर्ष 2002-03 में कृषि क्षेत्र में विकास दर शून्य से भी कम थी. 2003-04 में इसमें ज़बरदस्त उछाल आया और ये 10 फ़ीसदी हो गई लेकिन 2004-05 में विकास दर फिर लुढ़क गई और ऐसी लुढ़की कि 0.7 फ़ीसदी हो गई. आर्थिक प्रगति में इस विसंगति को केंद्र सरकार भी स्वीकार करती है. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल कहते हैं, “कृषि पीछे है इसमें कोई दो राय नहीं. अगर विकास दर को 10 फ़ीसदी करना है तो कृषि में भी चार फ़ीसदी की दर से विकास करना होगा

ऑफलाइन डेबिट खरीददारी पर व्यापारी को चार्ज किए गए शुल्क के लिए – और ऑनलाइन डेबिट खरीददारी या कागजी चेकों के प्रक्रमण के लिए व्यापारी को किए गए चार्ज के लिए – वीसा और मास्टर कार्ड जैसे डेबिट कार्ड लेनदेन संसाधकों के खिलाफ मुकदमा करने में U.S. में कुछ प्रमुख व्यापारी बहुत ही तत्पर होते हैं। 2003 में, वीसा और मास्टरकार्ड अपने ज्यादातर मुकदमा से निपटारा करने पर सहमत हो गए और अरबों डॉलर चुकता करने पर भी सहमत हो गए।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

जैव उर्वरक जीवाणु खाद है। खाद में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु वायुमण्डल में पहले से विद्यमान नाइट्रोजन को पकड़कर फसल को उपलब्ध कराते हैं और मिट्टी में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस को पानी में घुलनशील बनाकर पौधों को देते हैं।। इस प्रकार रासायनिक खाद की आवश्यकता सीमित हो जाती है। वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि जैविक खाद के प्रयोग से 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर भूमि को प्राप्त हो जाती है तथा उपज 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसलिए रासायनिक उर्वरकों को थोड़ा कम प्रयोग करके बदले में जैविक खाद का प्रयोग करके फसलों की भरपूर उपज पाई जा सकती है। जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरकों के पूरक तो हैं ही साथ ही ये उनकी क्षमता भी बढ़ाते हैं। फास्फोबैक्टीरिया और माइकोराइजा नामक जैव उर्वरक के प्रयोग से खेत में फास्फोरस की उपलब्धता में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है। इसका प्रयोग करने से फसल उत्पादन की लागत घटती है। नाईट्रोजन व घुलनशील फास्फोरस की फसल के लिए उपलब्धता बढ़ती है। भूमि की मृदा संरचना बेहतर रहती है। जैविक खाद का प्रयोग कैसे करें जैव उर्वरकों का प्रयोग बीजोपचार या जड़ उपचार अथवा मृदा उपचार द्वारा किया जाता है। i. बीजोपचार- बीजोपचार के लिए 200 ग्राम जैव उर्वरक का आधा लीटर पानी में घोल बनाएँ इस घोल को 10-15 किलो बीज के ढेर पर धीरे-धीरे डालकर हाथों से मिलाएँ जिससे कि जैव उर्वरक अच्छी तरह और समान रूप से बीजों पर चिपक जाएँ। इस प्रकार तैयार उपचारित बीज को छाया में सुखाकर तुरन्त बुआई कर दें। ii. जड़ उपचार- जैविक खाद का जड़ोपचार द्वारा प्रयोग रोपाई वाली फसलों में करते हैं। चार किलोग्राम जैव उर्वरक का 20-25 लीटर पानी में घोल बनाएँ। एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त पौध की जड़ों को 25-30 मिनट तक उपरोक्त घोल में डुबोकर रखें। उपचारित पौध को छाया में रखें तथा यथाशीघ्र रोपाई कर दें। iii. मृदा उपचार- एक हेक्टेयर भूमि के लिए, 200 ग्राम वाले 25 पैकेट जैविक खाद की आवश्यकता पड़ती है। 50 किलोग्राम मिट्टी, 50 किलोग्राम कम्पोस्ट खाद में 5 किलोग्राम जैव उर्वरक को अच्छी तरह मिलाएँ। इस मिश्रण को एक हेकटेयर क्षेत्रफल में बुआई के समय या बुआई से 24 घंटे पहले समान रूप से छिड़कें। इसे बुआई के समय कूंडों या खूंडों में भी डाल सकते हैं। जाने कैसे तैयार होता है कम्पोस्ट खाद कम्पोस्टिंग वनस्पति और पशु अपशिष्ट को तुरन्त गलाकर खेत में मौजूद अन्य अपशिष्टों को भी पौधे के भोजन के लिए तैयार करते हैं। इन अपशिष्टों में पत्तियाँ, जड़ें, ठूंठ, फसल के अवशेष, पुआल, बाड़, घास-पात आदि शामिल हैं। तैयार कम्पोस्ट भुरभुरे, भूरा से गहरा भूरा आद्रता वाली सामग्री का मिश्रण जैसी होती है। मूल रूप से कम्पोस्ट दो प्रकार के होते हैं। पहला एरोबिक और दूसरा गैर-एरोबिक। वर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद तैयार करने की विधि केंचुआ खाद तैयार करने के लिए छायादार स्थान में 10 फीट लम्बा, 3 फीट चौड़ा, 12 इंच गहरा पक्का ईंट सीमेंट का ढाँचा बनाएँ जमीन से 12 इंच ऊँचे चबूतरे पर यह निर्माण करें। इस ढाँचे में आधी या पूरी पची (पकी) गोबर कचरे की खाद बिछा दें। इसमें 100 केंचुए डालें। इसके ऊपर जूट के बोरे डालकर प्रतिदिन सुबह-शाम पानी डालते रहें। इसमें 60 प्रतिशत से ज्यादा नमी ना रहे। दो माह बाद यह खाद बन जाएगी, 15 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से इस खाद का उपयोग करें। वर्मी कम्पोस्ट के लिए केंचुए की मुख्य किस्में- आइसीनिया फोटिडा, यूड्रिलस यूजीनिया और पेरियोनेक्स एक्जकेटस है। यह मिट्टी की उर्वरता एवं उत्पादकता को लम्बे समय तक बनाए रखती हैं। मृदा की उर्वराशक्ति बढती है जिससे फसल उत्पादन में स्थिरता के साथ गुणात्मक सुधार होता है। यह नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस एवं पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को भ
ी सक्रिय करता है। वर्मी कम्पोस्ट के लाभ जैविक खाद होने के कारण वर्मी कम्पोस्ट में लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता अधिक होती है जो भूमि में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के लिए लाभदायक एवं उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। वर्मी कम्पोस्ट में उपस्थित पौध पोषक तत्व पौधों को आसानी से उपलब्ध हो जाते है। मृदा में जीवांश पदार्थ (ह्यूमस) की वृद्धि होती है, जिससे मृदा संरचना, वायु संचार तथा जल धारण क्षमता बढ़ने के साथ-साथ भूमि उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है। अपशिष्ट पदार्थों या जैव उपघटित कूड़े-कचरे का पुनः चक्रण आसानी से हो जाता है। मटका खाद तैयार करने की विधि मटका खाद तैयार करने के लिए गौमूत्र 10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 500 ग्राम, बेसन 500 ग्राम- सभी को मिलाकर मटके में भरकर 10 दिन सड़ाएँ। फिर 200 लीटर पानी में घोलकर गीली जमीन पर कतारों के बीच छिड़क दें। 15 दिन बाद दोबारा इसका छिड़काव करें। हरी खाद तैयार करने की विधि हरी खाद बनाने में लेगुमिनस पौधे का उत्पादन शामिल होता है। उनका उपयोग उनके सहजीवी नाइट्रोजन या नाइट्रोजन फिक्सिंग क्षमता के कारण किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में गैर लेगुमिनस पौध का भी उपयोग किया जाता है। आमतौर पर मैदानी इलाके में सनई, ढैंचा आदि को हरी खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। पूरी फसल को मिट्टी पलट हल से जोत दिया जाता है। इससे फसल मिट्टी में दब जाती है और सड़ने के बाद खाद बन जाती है। जैव उर्वरक उर्वरकों का सुरक्षित स्वरूप है यह कृषि के लिए सरल एवं सुरक्षित है आप सभी किसान भाइयों से मेरा निवेदन है की अपने बेहतर कल के लिए इसका प्रयोग करें तथा लोगों को भी प्रेरित करें इसके प्रयोग से खेती उपजाऊ सुरक्षित एवं लाभप्रद होती है देश को तथा किसानों को संकट से उबारनें के लिए जैविक खेती करें इसका प्रसार प्रचार करें कृपा करके भ्रांतियां न फैलाएं

लोहाघाट (चंपावत)। राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पीएम भारतीय जन औषधि केंद्र खुलने से लोगों को काफी राहत है। केंद्र में बाजार से सस्ती जेनरिक दवाएं मिलने से भारी भीड़ उमड़ रही है। केंद्र खुलने के तीन दिन के भीतर ही करीब 520 से अधिक लोग इसका लाभ उठा चुके हैं।

हाल ही के कई अध्ययनों में, अश्वगंधा में तनाव रोधी (Antistress), एंटीऑक्सिडेंट (Antioxidant), दर्द दूर करने वाले (Analgesic), अनुत्तेजक (Anti inflammatory), हृदय की सुरक्षा करने वाले तथा प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ाने वाले गुण पाए गए हैं। यह ब्रेन कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, स्किन कैंसर, गुर्दे का कैंसर और ब्रैस्ट कैंसर सहित कई प्रकार के कैंसर के इलाज में प्रभावी साबित हुआ है।

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