“मैं सर्वश्रेष्ठ मूल्य +जहां मैं सर्वश्रेष्ठ कीमत पर नॉट्रॉपिक्स स्मार्ट दवाओं की सस्ती सूची पा सकता हूं”

स्मार्ट बनने के लिए लड़के क्या-क्या नहीं करते। कोई फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल करता है तो कोई जिम जाता है। लेकिन आज हम आपको बताएंगे वो छोटी-छोटी बातें जिनके बिना आपके स्मार्ट होने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए Jagadhari News in Hindi सबसे पहले दैनिक भास्कर पर | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.

आर्थिक संकट में घिरे किसान,पशु व खेती यंत्र बेचने को मजबूर – posted on : Sep, 28 2015 भटिंडाःसंकट में घिरे किसान अब अपने पशु व खेती यंत्र बेचने लगे है। कोई दुधारू पशु बेच रहा है तो कोई ट्रैक्टर। सरकारी मुआवज़ा जख्मों पर नमक छिड़क रहा है। सफेद मच्छर के साथ नरमे की बर्बादी कारण किसानों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई है। पशु मंडियों और ट्रैक्टर मंडियों में भीड़ बढ़ गई है। बेचने वाले ज्यादा हैं और खरीदने वाला कोई नहीं। तलवंडी साबो के गांव राईआ के किसान जगजीत सिंह को ज़मीन का ठेका उतारने के लिए 2 दुधारू भैंसें करीब 40 हज़ार का घाटा उठाकर बेचनीं पड़ीं हैं।किसान दर्शन सिंह को 10 दिन पहले एक लाख में ही ट्रैक्टर बेचना पड़ा। कपास पट्टी के तलवंडी साबो, मोगा, मलोट, बरनाला और सलावतपुरा की ट्रैक्टर मंडी में सफेद मच्छर के पीडित किसानों की भीड़ होती है। मलोट की ट्रैक्टर मंडी के दलाल हरप्रीत सिंह ने बताया कि ट्रैक्टरों के उतने ग्राहक नहीं, जितने बेचने वाले हैं।

एक मुख्य चिंता निष्पक्षता है। कल्पना कीजिए कि जब आप अपनी मानसिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए दौड़ रहे हैं, तो आपका सहयोगी इसके बजाय रितलिन को भगा रहा है। जब आप एकाग्रता हासिल करने के लिए अपनी दोपहर की झपकी में विश्वास करते हैं, तो आपका कार्यालय साथी प्रावीगिल पर निर्भर करता है अनुचित? सामान्य जनता सोचती है कि स्मार्ट दवाओं को धोखाधड़ी करना धोखाधड़ी है, क्योंकि यह उपयोगकर्ताओं को एक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकती है वास्तव में, यहां तक ​​कि कई शिक्षाविदों तर्क किया है कि मस्तिष्क डोपिंग उन लोगों के लिए अनुचित है जो ऐसा नहीं करते हैं।

स्मार्ट किसान ट्रस्ट द्वारा बाज़ारों तक पहुँच आसान बनाना – posted on : Apr, 20 2016 किसानों को अपने उत्पाद मार्केट तक पहुँचने और ज़रूरत होने पर उन्हे उचित कीमत की योग्यता मिलनी चाहिए. – दूरस्थ क्षेत्रों तक मार्केट की कीमतों की ताज़ातरीन जानकारी पहुँचाना – पारदर्शी जानकारी, उचित कीमतों, मजबूत बुनियादी विकास और कम अटकलबाज़ियों के मध्यम से मार्केटों का बढ़िया क्रियान्वयन विकसित करना – छोटे किसानों के लिए मार्केटिंग के सहकारी तरीकों को प्रोत्साहित करना – उद्योगपति प्रशिक्षण के माध्यम से छोटे किसानों की मार्केटिंग योग्यताओं को बेहतर बनाना – दुनिया भर में कृषि के सभी स्तरों के लिए अवसर बढ़ाने की खातिर मार्केट की कमियों को कम करना

हेल्लो दोस्तों मैं हु संदीप ओला और आज मैं आपको गुलाब की खेती एक बारे में बताऊंगा की कैसे आप भी गुलाब की खेती करके विदेशों में बेचकर पैसे कमा सकते है दोस्तों फूलों में गुलाब भी महंगे फूलों की लिस्ट में आता है. दोस्तों कहते है की गुलाब का फूल कीचड़ में भी उग जाता है क्या आपके अंदर वैसी क्षमता है आप विपरीत परिस्थियों में डटे रहते है या भाग खड़े होते है. आप इसकी खेती कैसे करनी ये सिखने के साथ भी सिख भी लेनी है की कितनी भी परेशानी क्यों ना जाए आप सामना करेंगे. गुलाब वानस्पतिक नाम – रोजा इंडिका कुल – रोजेसी सामान्य विवरण – गुलाब एक झाड़ीनुमा बहु-वर्षीय पौधा है जो कि सुन्दर पुष्पों के लिए उगाया जाता है। उत्पत्ति स्थान निश्चित नहीं है किन्तु रोम, मिस्र और भारत में प्राचीन काल से उगाया जाता है। यह सर्वाधिक लोकप्रिय पुष्प है, इसलिए फूलों का राजा कहा जाता है। सुन्दरता के लिए क्यारियों तथा गमलों में उगाया जाता है। फूलदानों में भी सजाया जाता है। गुलाब जल, गुलाब इत्र, गुलकंद तथा पेय पदार्थ तैयार करने में गुलाब का उपयोग होता है। विटामिन ‘सी’ भी गुलाब में होता है। गुलाब का पौधा एक वर्ष में दो किलो पुष्प देता है तथा 8 से 10 वर्ष तक फूलता रहता है। जिस क्यारी में इसे उगाया जाता है, ’रोजरी’ और गुलाब उत्पादक को ‘रोजेरियन’ कहते है। पंखुडि़याँ – कड़वी, कषैली और उत्तम सुगन्ध वाली होती है। शीतलतादायक, दस्तावर, उत्तेजक, ज्वरनाशक, त्रिदोष नाशक, जलन नाशक। कुष्ठ में लाभदायक मुंह की गंध नष्ट करता है। क्षुधावर्धक, कफ निःसारक, हृदय बलवर्धक और आंखों के लिये उत्तम। सिर दर्द, पेट दर्द, मुखपाक में लाभदायी। फेफड़े, गुर्दे तथा यकृत में लाभकरक। गर्मी, पुराना ज्वर, दाह सूजन में आराम पहुँचता है। (आयुर्वेद)। गुलाब के तेल में सिट्रोनेलाल Citronellol)], नेराल (Nerol)], जिरेनिऑल Geraniol)], लिनेलूल Linalool), फेनिल एथिल एल्कोहाॅल (Phenyl Ethyl Alcohol), फार्नसोल (Farnasol), सिट्रल (Citral), यूजिनाॅल (Eugenol)प्रमुख रासायनिक तत्व होते है। इसके साथ ही कुछ अन्य तत्व जैसे – डैमस्कोन, रोज ऑक्साइड और राजे फ्यूरान आदि। प्रमुख किस्में – गुलाब को 18 प्रजातियों में विभक्त किया गया है, जिनमें 8 प्रजातियाँ जंगली गुलाब की हैं। कुछ प्रमुख जातियाँ इस प्रकार है: 1. ‘टी’ रोज Tea Rose) – सुगन्धित पुष्प जिनके खिलने पर चाय की पत्तियों जैसी सुगन्ध आती है। विपुलता से फूलते हैं। संकर ‘टी’ किस्मों के विकास के कारण इन्हें कम लगाया जाता है। लेडी हेलिंग्डन, मोली शर्मन आदि प्रमुख किस्में है। 2. शकर ‘टी’ रोज Hybrid Tea Rose) – संकर परपीचुएल्स और टी गुलाब के संकरण से विकसित की गई किस्में है। वर्तमान समय में लोकप्रिय किस्में इसी समूह के अंतर्गत आती हैं। रंगों के अनुसार कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं: सफेद – तुशार, वीर्गो, स्वामी विवेकानंद, डाॅ. होमी भाभा। गुलाबी – कान्फीडेन्स, फम्र्ट प्राइज, मिशेल मैलेण्ड। पीला – गोल्डेन जाइण्ट, मैक-ग्रेडी सन-सेट, पीस, रंभा, गे्रनेडा, ग्रेन्ड मेरी जेनी, किंग रेन्सम। नारंगी-सिन्दूरी, मूंगा, सिन्दूरी – अरूणा, मान्टीजुमा, सुपर स्टार। लाल से गहरा लोहित रंग – एवन, क्रिश्चियन डायर, एलेक्स रेड क्रिमसन ग्लोरी, मिस्टर लिंकन, ओकलाहोमा, कालिमा, लालबहादुर, भीम, एलेक्स रेड, हैपीने। मोतिया रंग – ब्ल्यूमून, लेडी एक्स, अफ्रीका स्टार। दो रंग मिश्रित – बजाजो (लाल-भूरा सफेद), फलेमिंग सन्सेट (गहरा नारंगी-पीला), अकेबनो (पीला-लाल)। मिश्रित रंग – अमेरिकन हेरिटेज, केअर-लेस, लव, किस ऑफ फायर, एनविल स्पार्क, तहीटी, थैस।

ध्यान में रखिए कि पूरक अत्यधिक नशे की लत रासायनिक डोपामाइन शामिल. इस प्रकार, यह अधिक से अधिक तीन बार एक हफ्ते का उपयोग नहीं करने के लिए यह सबसे अच्छा है सतर्कता के साथ मदद करने के लिए. अगर एक नियमित आधार पर इस्तेमाल किया, यह एक सहिष्णुता buildup करने के लिए ले जा सकता है और एक लत में परिणाम सकता है.

नई दिल्ली। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी प्याज के दाम आसमान छू रहे हैं। प्याज खाने वालों की थाली से प्याज गायब हो रहा है। वहीं, दुकानदारों का कहना है कि प्याज की आपूर्ति कम होने की वजह से भाव चढ़ रहा है। दिल्ली की बात करें तो ओखला मंडी में प्याज थोक भाव में 50 से 60 रुपये किलो तक बिक रहा है। इसकी वजह से खुदरा बाजार में भी प्याज के दाम में तेजी आई है और दिल्ली के बाजारों में प्याज 60 से 70 रुपए प्रति किलो बिक रहा है और आशंका है कि खुदरा बाजार में प्याज की कीमतों में और उछाल आ सकता है।

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है. मिचरें में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइिसन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है. देश में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है. इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है. मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है. बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिचरे में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्र पायी जाती है. मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं. एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है. जलवायु मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भांति उगती है. लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है। गर्म मौसम की फसल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो. बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सेंटी ग्रेड तापामन पर होता है. यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियां, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं. मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डिग्री सेंटी ग्रेड है. तेज़ मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है. फूलते समय ओस गिरना या तेज वर्षा होना फसल के लिए नुकसानदाई होता है. क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं. किस्में पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियां चौड़ी होती हैं. फल 9-10 सेंटीमीटर लंबे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं. इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी मिर्च के लिए होती है. पूसा सदाबाहर : इस किस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सेंटीमीटर होते हैं. फल 6-8 सें मी. लंबे, गुच्छों में , 6-14 फल प्रति गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है. औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, सूखी मिर्च के लिए होती है. यह किस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है. मृदा एवं खेती की तैयारी मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बिनक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियां इसके लिए सर्वेतम होती हैं. जहां फसल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है. बरसाती फसल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए. जमीन पांच-छ: बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है. गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए. खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं. नर्सरी प्रबंध नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए. पर्याप्त मात्र में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है. नर्सरी में पर्याप्त मात्र में धूप का आना भी जरूरी है. नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए . नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौडाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्यो में कठिनाई आती है. नर्सरी की उंचाई छह इंच या आधा फीट रखनी चाहिए. बीज की बुआई कतारों में करें. कतारों का फासला पांच-सात सेंटीमीटर रखा जाता है. पौध लगभग छह सप्ताह में तैयार हो जाती है. पौध संरक्षण आर्द्रगलन रोग यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है. इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है. इस रोग से बच
ाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान दो ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए. इसके अलावा कैप्टान दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए. एन्थ्रेक्नोज रोग इस रोग में पित्तयों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पडते है. इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए. मरोडिया लीफ कर्ल रोग यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है. यह रोग बरसात की फसल में ज्यादातर आता है. शुरू में पत्ते मुरझा जाते है. एवं वृद्धि रु क जाती है। अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुंचाता है. यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है. यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है. अत: इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है. इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स दो मिलीलीटर प्रति ली की दर से छिडकाव करें. इस रोग की प्रतिरोधी किस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए. मौजेक रोग इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड जाते है. बाद में पित्तयाँ पूरी तरह से पीली पड जाती है. तथा वृद्धि रु क जाती है. यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है. थ्रिप्स एवं एफिड ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है. रोगर या मैटासिस्टाक्स दो मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है. उपज : सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. बीज-दर एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेयर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफी होता है. निराई-गुड़ाई पौधों की वृद्धि की आरिम्भक अवस्था में खरपतवारों पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है. पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है. सिंचाई पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरंत बाद की जाती है. बाद में गर्म मौसम में हर पांच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फसल को सींचा जाता है. बुआई मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है. बड़े फलों वाली किस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है. उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग छह सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है. इसके अलावा दूसरी फसल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फसल मार्च से मई तक ली जाती है. खाद एवं उर्वरक गोबर की सडी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है. यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए

अल्फा मस्तिष्क सबसे प्रभावी उत्पादों में से एक है बाजार में है कि nootropic हालत में अच्छा कर रहे हैं. पूरक Onnit प्रयोगशालाओं द्वारा बनाई गई है, एक प्रसिद्ध स्वास्थ्य और पूरक प्रदाता. कंपनी के रूप में अच्छी तरह से अन्य उत्पादों की एक नंबर प्रदान करता है. कंपनी द्वारा सभी उत्पादों को अच्छी तरह से परीक्षण कर रहे हैं, शोध और प्रभावी ढंग से गठित. कंपनी के महत्वपूर्ण संसाधनों और वित्त उपयोगी उत्पादों है कि मस्तिष्क संबंधी वृद्धि समर्थन में निवेश करने की योजना है. कंपनी की वेबसाइट के महत्वपूर्ण लेख का एक बहुत है, वीडियो और उत्पाद के प्रचार. ऑनलाइन अल्फा मस्तिष्क को खरीदने के लिए यहां क्लिक करें.

बागेश्वर और टनकपुर में यूजर्स चार्जेज में खेल हुआ। संयुक्त चिकित्सालय टनकपुर में 1.21 लाख रुपये यूजर्स चार्जेज को चिकित्सालय कोष में जमा नहीं कराया गया। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भीमताल में यूजर्स चार्जेज से संबंधित बैंक पास बुक और कैश बुक में जमा-शेष धनराशि में अंतर अनियमितता की ओर इशारा कर रहा है। 

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा मेडिकल और डेंटल कोर्स में दाखिले के लिए आयोजित की जाने वाली प्रवेश परीक्षा नीट 2017 का एडमिट कार्ड जारी किए जाने के बाद स्टूडेंट्स ने अपनी तैयारी और तेज कर दी है. परीक्षा का आयोजन 7 मई 2017 को किया जाएगा. ऐसे में विद्यार्थियों को शेष बचे करीब 15 दिनों के लिए एक अलग, सटीक और अनुशासित रणनीति बनानी होगी. अंतिम दिनों में बनाई गई स्ट्रेटेजी ही आपका डॉक्टर बनने का सपना साकार करेगी. अंतिम इसलिए आपकी तैयारी स्मार्ट होनी चाहिए, 

गन्ने के कीट एवं उपचार – posted on : Aug, 09 2015 (1). दीमक (टरमाइट) बुवाई के समय पेड़ों के ऊपर अथवा फसल की कटाई के बाद अथवा खड़ी फसल में प्रकोप होने पर गन्ने के समीप नाली बनाकर किसी एक कीटनाशक का प्रयोग कर ढ़क देना चाहिए। 1. फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत धूल (टाटाफेन 0.4 प्रतिशत धूल) 25.0 किग्रा0 प्रति हेक्टे0 2. लिण्डेन 1.3 प्रतिशत धूल 25 किग्रा प्रति हेक्टे0 (2). दीमक एवं अंकुर बेधक बुवाई के समय नालियों में पैड़ो के ऊपर अथवा फसल की कटाई के बाद अथवा खड़ी फसल में प्रकोप होने पर गन्ने के समीप नाली बनाकर किसी एक कीट-नाशक का प्रयोग कर ढत्रक देना चाहिए। 1. क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत घोल 5.0 ली0 प्रति हेक्टे0 1875 ली0 पानी में घोल बनाकर हजारे द्वारा प्रयोग करना। 2. लिण्डेन (गामा बीएचसी) 20 प्रतिशत घोल 6.25 ली0 प्रति हेक्ट0 1875 ली0पानी में घोल बनाकर हजारे द्वारा प्रयोग करना। 3. 10: रवा 25 ग्रा0/हे0 4. 6: रवा 20 ग्रा0/हे0 5. कार्बेराइल-गामा बीएचसी 4:4 रवा(सेवीडाल रवा) 25 किग्रा प्रति हेक्टे0। 6. रीजेण्ट 0.3 प्रतिशत रवा (फिप्रोनिल)200 किग्रा/हे0 (3). अंकुर बेधक ;श्शूट बोरर ग्रीष्मकाल में फसल पर 15 दिन के अन्तर पर तीन बार मेटासिड 50 प्रतिशत घोल 1.0 ली0 को 625 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टे0 की दर छिड़काव। 1 आंकुर बेधक से ग्रसित पौधों को सूड़ी सहित काटकर निकालना। 2 जमाव के पश्चात गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य 100 कु0 प्रति हेक्टे0 की दर से सूखी पताई बिछाना। (4). चोटीबेधक( टॉपबोरर) बुवाई के समय (शरद एवं बसंत) नालियों में 30 किग्रा कार्बोफयूरान 3 जी0 का प्रयोग प्रथम व द्वितीय पीढ़ी के नियंत्रण हेतु करना। 1. मार्च एवं मई दोनों के प्रथम पखवारों में चोटीबेधक के प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी के अण्ड समूहों को एकत्रित करके नष्ट करना। 2. अप्रैल एवं मई में चोटीबेधक के प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी से ग्रसित पौधों को सूड़ी/प्यूपा सहित काटकर नष्ट करना। 3. जून के अंतिम या जुलाई के प्रथम सप्ताह में तृतीय पीढ़ी के विरूद्ध अधिकतम अण्डरोपण की अवधि में 30 किग्रा0 कार्बोफयूरान 4. जी0 प्रति हेक्टे0 पौधों के समीप नमी की दशा में डालना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *